उत्तराखंड हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने पहले से मौजूद सेवाओं की शर्तों की सुरक्षा, कर्मचारियों के लिए अलग प्रमोशन क्राइटेरिया को सही ठहराती है.
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट के वरिष्ठ जज मनोज कुमार तिवारी और जस्टिस पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने माना कि 2018 के सर्विस बाय-लॉज के तहत बनाया गया वर्गीकरण संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत उचित और वैध है. यह वर्गीकरण एक बाध्यकारी वादे के आधार पर एब्जॉर्ब किए गए यूपीसीएल कर्मचारियों की पहले से मौजूद सर्विस की शर्तों की सुरक्षा करता है और उन्हें उन याचिकाकर्ताओं से भी अलग करता है, जिन्हें सीधे यूपीसीएल में नियुक्त किया गया और जिन्हें प्रमोशन के लिए 10 साल की क्वालीफाइंग सर्विस की आवश्यकता होती है.
मामले के अनुसार, राहुल गिरी और अन्य को उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड यूपीसीएल के गठन के बाद लेबर (मजदूर) के तौर पर नियुक्त किया गया. बाद में उन्हें 2011-2012 में टेक्नीशियन ग्रेड-II के पद पर पदोन्नति दी गई. उन्होंने हाईकोर्ट के सामने यूपीसीएल जूनियर इंजीनियर (इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल) सर्विस बाय-लॉज, 2018 के खंड 20 (बी) को चुनौती दी. इस प्रावधान के तहत टेक्नीशियन ग्रेड-II कर्मचारियों को जूनियर इंजीनियर के पद पर पदौन्नति के लिए पात्र होने से पहले दस साल की सेवा पूरी करनी आवश्यक है.
हालांकि, उसी नियम के एक प्रावधान में उन कर्मचारियों को 1972 के नियमावली के तहत आने की अनुमति दी गई, जो पहले उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड (यूपीएसईबी) या उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) में कार्यरत थे और बाद में उन्हें यूपीसीएल में समायोजित कर लिए गए. 1972 की नियमावली अधिक विस्तृत थी, जिनमें पदौन्नति के लिए केवल पांच साल की सर्विस पूरी करनी आवश्यक थी.
इससे असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ताओं ने याचिका दायर करके उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड जूनियर इंजीनियर (इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल) सर्विस बाय-लॉज, 2018 के खंड 20(बी) की वैधता को चुनौती दी. याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि उनके प्रमोशन के मामले पर यूपी राज्य विद्युत बोर्ड/यूपी पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के उन कर्मचारियों के साथ विचार किया जाए जो उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड में ग्रहण किए गए.
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि उन्हें और उन लोगों के दूसरे समूह को, जिन्हें प्रमोशन के लिए पांच साल तक सेवा करनी होती है, लेबर के तौर पर नियुक्त किया गया और टेक्नीशियन ग्रेड-II के पद पर प्रमोशन के बाद वे एक ही श्रेणी के सदस्य बन गए. इसलिए उनके साथ अलग से भेदभाव नहीं किया जा सकता.
कहा कि सर्विस बाय-लॉज, 2018 के नियम 20(बी) के प्रावधान ने इस वर्ग को मनमाने ढंग से दो समूहों में विभाजित कर दिया है. एक समूह को प्रमोशन के लिए दस साल तक सेवा करनी होती है, जबकि दूसरे को केवल पांच साल की सेवा की जरूत होती है. आगे यह भी तर्क दिया गया कि इस तरह का भेदभाव भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह बिना किसी उचित आधार के समान लोगों के साथ असमान व्यवहार करता है.
दूसरी ओर, यूपीसीएल ने तर्क दिया कि कॉर्पोरेशन 5 नवंबर 2001 को अस्तित्व में आया और यूपीसीएल के कर्मचारियों को शुरू में अस्थायी तौर पर माना गया और बाद में एक कार्यालयी आदेश के जरिए 1 जनवरी 2003 से यूपीसीएल में शामिल कर लिया गया. यह बताया गया कि कार्यालयी आदेश के खंड एक में यह प्रावधान था कि शामिल किए गए कर्मचारियों की सेवा शर्तों में उनके नुकसान के लिए कोई बदलाव नहीं किया जाएगा.
इस प्रकार यह तर्क दिया गया कि जो लोग यूपीसीसीएल में नियुक्त हुए और बाद में यूपीसीएल के कर्मचारी बने, वे सक्षम अधिकारी द्वारा 2002 में दिए गए आश्वासन को देखते हुए एक अलग वर्ग बनाते हैं और याचिकाकर्ता उन कर्मचारियों के साथ समानता का दावा नहीं कर सकते जो कार्यालयी आदेश द्वारा संरक्षित हैं.
आगे यह भी कहा गया कि, कार्यालयी आदेश का खंड एक उन कर्मचारियों से किए गए वादे की तरह है, जिन्हें यूपीसीएल की सेवा में शामिल किया गया. यह वादा यूपीसीसीएल के कर्मचारियों को भरोसा दिलाने के लिए किया गया था कि यूपीपीसीएल में शामिल होने पर उनकी सेवा शर्तों पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा. शुरू में, यूपीसीएल के कर्मचारी अपने भविष्य की संभावनाओं को लेकर अनिश्चितता के कारण यूपीसीएल में अपनी सेवा के विलय के लिए तैयार नहीं थे. इसलिए उन लोगों से वादा किया गया, जो विलय के जरिए यूपीसीएल के कर्मचारी बने. इसलिए ऐसे कर्मचारियों को 2018 में बनाए गए सर्विस बाय-लॉज में प्रमोशन के लिए दस साल की क्वालीफाइंग सर्विस की जरूरत से छूट दी गई.
सभी पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने देखा कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 14 विशेष वर्ग के लिए कानून बनाना को रोकता है, लेकिन उचित वर्गीकरण की अनुमति देता है. बशर्ते उसका उस उद्देश्य से तर्कसंगत संबंध हो जिसे हासिल किया जाना है. यूपीसीएल से लिए गए कर्मचारियों ने कार्यालयी आदेश के कारण एक अलग वर्ग बनाया. इस आदेश में उन्हें भरोसा दिलाया गया कि उनकी सेवा की शर्तें वैसी ही रहेंगी. यह भी देखा गया कि एक नियोक्ता के तौर पर यूपीसीएल सेवा की शर्तें तय करने में सक्षम था, जिसमें प्रमोशन के लिए जरूरी सेवा अवधि भी शामिल थी और 2018 की सेवा नियमावली में टेक्नीशियन ग्रेड-II कर्मचारियों के लिए दस साल की सेवा जरूरी बताई गई.
यह भी ध्यान दिया गया कि लिए गए कर्मचारियों को मिली सुरक्षा के कारण यूपीसीएल उन पर नया नियम लागू नहीं कर सकता. यह माना गया कि, कार्यालयी आदेश के दायरे में आने वाले कर्मचारी ‘संरक्षित वर्ग’ का हिस्सा थे, जबकि याचिकाकर्ताओं को ऐसी कोई सुरक्षा नहीं दी गई.
इसलिए यह माना गया कि सेवा नियमावली 2018 के नियम 20(बी) (दो) के प्रावधान के तहत किया गया वर्गीकरण बनावटी वर्गीकरण नहीं कहा जा सकता. क्योंकि इसके लिए गए कर्मचारियों के पहले से मौजूद अधिकारों की रक्षा करने के उद्देश्य से उचित संबंध है.